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Friday, 25 February 2022

इतिहासकारों एवं पुरातत्त्वविदों के 16 सदस्यीय दल ने दरभंगा के कोठरा डीह का किया सर्वेक्षण

 इतिहासकारों एवं पुरातत्त्वविदों के 16 सदस्यीय दल ने दरभंगा के कोठरा डीह का किया सर्वेक्षण




न्यूज़ डेस्क : मधुबनी



 गुरुवार, दिनांक 25/02/2022 को ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग, दरभंगा के एक 16 सदस्यों का सर्वेक्षण दल विभागाध्यक्ष डॉ उदय नारायण तिवारी के नेतृत्व में दरभंगा जिला के हायाघाट थाना और बहेड़ी प्रखंड अंतर्गत कोठरा गांव में स्थित कोठरा डीह(कुमर अंगार डीह) का सर्वेक्षण किया।


      स्थानीय लोग बताते हैं कि यह पुरास्थल कुमर अंगार, लोरिक आदि से संबंधित है। सर्वेक्षण के दौरान पुरास्थल से मृणमूर्ति, धूसर मृदभांड, काला चमकीला मृदभांड, काला लाल मृदभांड, कतिपय रिंग वेल, ईट का संरचना, लोढी, सिलवटे, ढक्कन, जांता, मुहर आदि पुरावशेष प्राप्त हुए हैं।


        बताते चलें कि 23 फरवरी को सर्वेक्षण हेतु गए प्राचीन भारतीय इतिहास विभाग के शोधार्थी अभय चंद्र यादव ने पुरास्थल से मिट्टी कटाई की सूचना विभाग को दी, जिसको संज्ञान में लेते हुए पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ अयोध्या नाथ झा ने दरभंगा जिलाधिकारी को और डॉ शिवकुमार मिश्र संग्रहालयाध्यक्ष चंद्रधारी संग्रहालय, दरभंगा ने बिहार के पुरातत्व निदेशक श्री दीपक आनंद से पुरास्थल को बचाने की अपील की थी। यह सूचना पाकर प्रशासन सक्रिय हुआ और 24 फरवरी को विभाग के शोधार्थी मुरारी कुमार झा और श्री चंद्र प्रकाश महाराजाधिराज लक्ष्मीश्वर सिंह संग्रहालय, दरभंगा के तकनीकी सहायक के साथ थाना अध्यक्ष हायाघाट, सीईओ बहेड़ी और खनन विभाग दरभंगा ने निरीक्षण करते हुए जेसीबी ट्रैक्टर मालिक को हिदायत देते हुए मिट्टी कटाई प्रतिबंधित करवा दिया।


          पुरास्थल के अवलोकन के उपरांत विभागाध्यक्ष डॉ तिवारी ने कहा कि "प्राचीन रिहायशी बस्ती के साक्ष्य इस पुरास्थल पर दिग्दर्शित हुए हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि सदियों पूर्व यह स्थल आबाद था। करेह नदी के मार्ग बदलने के कारण यहां के निवासी दूसरे जगहों की ओर स्थानांतरित हो गए और प्राचीन बस्ती के साक्ष्य नदी के गर्भ तथा उसके सम तटवर्ती क्षेत्रों में बिखरे पड़े हैं। इस पुरास्थल की खुदाई करने से महत्वपूर्ण साक्ष्य स्पष्ट होंगे।"

          पूर्व विभागाध्यक्ष डा अयोध्या नाथ झा ने कहा कि "चूंकि जनश्रुति है कि यह स्थल लोरिक के भांजे कुमर अंगार का डीह है और लोरिक का समय मध्यकाल है, उस आधार पर हम यह कह सकते हैं कि यह पुरास्थल 800 वर्ष से पूर्व का है एवं स्थल से प्राप्त पुरावशेषों के अध्ययनों के आधार पर हम इसे गुप्तकालीन मान सकते हैं।"

            शोधार्थी मुरारी कुमार झा ने सर्वेक्षण की जानकारी देते हुए कहा कि "यह पुरास्थल करेह नदी के उत्तर में लगभग 400 मीटर लंबा और 100-150 मीटर चौड़ा भूखंड पर स्थित है। आज के सर्वेक्षण में 177 सेंटीमीटर व्यास वाले 8 रिंग वेल, कतिपय चित्रित प्राचीन मृदभांडावशेष, 29×22×6 सेंटीमीटर के ईंट, तीन जांता, दो औषधि पीसने के लिए प्रयुक्त हुए छोटे सिलवटे आदि से अब तक प्राप्त पुरावशेषों के आधार पर इस पुरास्थल की प्राचीनता प्रथम सदी तक हो सकती है। विशेष रहस्य और प्राचीनताओं को समझने के लिए इस स्थल की वैज्ञानिक पद्धति से उत्खनन कार्य करवाना अति आवश्यक है। बिहार सरकार इस स्थल को संरक्षित पुरास्थल की सूची में शामिल करे तथा बिहार सरकार के कला-संस्कृति एवं युवा विभाग के अंतर्गत महाराजाधिराज लक्ष्मीश्वर सिंह संग्रहालय, दरभंगा द्वारा धरोहर संरक्षण संबंधी जो कार्यक्रम वर्ष 2019 में दरभंगा जिला के सभी मुखिया, सरपंच, वार्ड सदस्य, अनुमंडलाधिकारी, अंचलाधिकारी, थानाध्यक्ष आदि के बीच जागरूकता हेतु आयोजित की गई थी, उसी कार्यक्रम को फिर आयोजित करने की अत्यंत आवश्यकता है। स्थानीय लोगों के पास पूर्व से मौजूद पुरावशेषों को शोध कार्य एवं अध्ययन के हेतु प्राचीन इतिहास विभाग को सौंपना और शोधार्थी श्री अभय चंद्र यादव जी का सहयोग अनुकरणीय है, इसके लिए इन सबों के प्रति हार्दिक आभार।"


         आज के सर्वेक्षण दल में विभागाध्यक्ष डॉ तिवारी, पूर्व विभागाध्यक्ष डा झा और विभाग की अतिथि शिक्षिका डा प्रतिभा किरण शोधार्थी अभय चंद्र यादव, मुरारी कुमार झा, गौतम प्रकाश, गिरिंद्र मोहन, चंद्रप्रकाश, पुष्पांजलि कुमारी, पूर्णिमा कुमारी के साथ कंचन कुमारी, प्रभाकर कुमार, गोपाल जी, विकास कुमार, सुभाष कुमार, गोविंद नारायण एवं ललन कुमार शामिल थे।

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