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रविवार, 1 नवंबर 2026

सहरसा के काँठो गाँव में पालकालीन गणेश प्रतिमा का पुरातात्विक अन्वेषण

 सहरसा के कांठो गाँव में पालकालीन गणेश प्रतिमा का पुरातात्त्विक अन्वेषण




9वीं से 11वीं शताब्दी ईस्वी के बीच निर्मित होने का अनुमान; कोसी क्षेत्र में गहन पुरातात्त्विक अन्वेषण की आवश्यकता



न्यूज़ डेस्क : मधुबनी 

 01:11: 2026


सहरसा : पूर्वी मिथिला के ऐतिहासिक एवं पुरातात्त्विक महत्त्व को समझने तथा क्षेत्र की उपेक्षित धरोहरों को अभिलेखित करने के उद्देश्य से इन दिनों पुरातत्त्व विषय के शोधकर्ता डॉ. मुरारी कुमार झा द्वारा क्षेत्रीय भ्रमण एवं पुरातात्त्विक अन्वेषण किया जा रहा है। इसी क्रम में आज सहरसा जिला अंतर्गत सिमरी बख्तियारपुर प्रखंड के कांठो गाँव स्थित प्रसिद्ध बाबा मटेश्वर महादेव मंदिर परिसर एवं उसके आसपास के क्षेत्र का पुरातात्त्विक अन्वेषण किया गया। इस दौरान गाँव से पिछले वर्ष मिट्टी की खुदाई के क्रम में प्राप्त पालकालीन भगवान गणेश की एक महत्वपूर्ण पाषाण प्रतिमा का प्रत्यक्ष अध्ययन एवं कलात्मक विश्लेषण किया गया।


प्राप्त जानकारी के अनुसार, पिछले वर्ष कांठो गाँव में मिट्टी की खुदाई के दौरान भगवान गणेश की यह प्रतिमा प्राप्त हुई थी। प्रतिमा के कलात्मक एवं प्रतिमा-विज्ञान संबंधी लक्षणों का अध्ययन करने पर इसके पालकालीन होने का अनुमान व्यक्त किया गया है। प्रतिमा का स्टेला ऊपर की ओर गोलाकार है। भगवान गणेश एकदंत रूप में अंकित हैं। उनके बाएँ कंधे पर सर्प का अंकन किया गया है तथा प्रतिमा के सबसे निचले भाग में उनके वाहन मूषक को दर्शाया गया है। प्रतिमा की बनावट, प्रस्तर पर उत्कीर्ण आकृतियों तथा समग्र कलात्मक विशेषताओं के आधार पर इसका निर्माणकाल लगभग 9वीं से 11वीं शताब्दी ईस्वी के बीच निर्धारित होने की संभावना है। हालाँकि, इसकी निश्चित तिथि के निर्धारण के लिए विस्तृत तुलनात्मक एवं शैलीगत अध्ययन अपेक्षित है।


उल्लेखनीय है कि कांठो गाँव स्थित बाबा मटेश्वर महादेव मंदिर का परिसर और उसके आसपास का क्षेत्र पहले से ही पुरातात्त्विक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण रहा है। इस क्षेत्र से पूर्व में भी अनेक देवी-देवताओं की पाषाण प्रतिमाओं सहित विभिन्न पुरावशेष प्राप्त होने की सूचनाएँ मिलती रही हैं। भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के Indian Archaeology 2006–07: A Review में भी कांठो के एक प्राचीन टीले का उल्लेख मिलता है, जहाँ से प्राचीन मृद्भांड, स्थापत्य अवशेष तथा टेराकोटा निर्मित वलय-कूप के अवशेषों की जानकारी दर्ज है। इन साक्ष्यों को देखते हुए यह क्षेत्र प्राचीन धार्मिक गतिविधियों के साथ-साथ एक विकसित ऐतिहासिक बसावट का भी संकेत देता है।


डॉ. मुरारी कुमार झा ने कहा कि पूर्वी मिथिला, विशेषकर कोसी क्षेत्र में अनेक ऐसे पुरास्थल और पुरावशेष मौजूद हैं, जिनका व्यवस्थित वैज्ञानिक अध्ययन अभी अपेक्षित है। कांठो गाँव से प्राप्त गणेश प्रतिमा इस क्षेत्र की समृद्ध पालकालीन कला-परंपरा तथा ऐतिहासिक सांस्कृतिक विरासत को समझने की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। यहाँ पूर्व में प्राप्त अन्य प्रतिमाओं एवं पुरावशेषों को भी एक साथ रखकर देखने की आवश्यकता है। इसके लिए कांठो गाँव और इसके विस्तृत परिक्षेत्र का व्यवस्थित पुरातात्त्विक सर्वेक्षण, पुरास्थलों का अभिलेखीकरण, पुरावशेषों का सूचीकरण तथा आवश्यकतानुसार वैज्ञानिक अन्वेषण किया जाना महत्त्वपूर्ण है।


धरोहर संवाद यात्रा से पूर्व पूर्वी मिथिला का पुरातात्त्विक भ्रमण


ध्यातव्य है कि डॉ. मुरारी कुमार झा अपनी प्रस्तावित ‘धरोहर संवाद यात्रा : दरभंगा से दिल्ली’ की तैयारी के क्रम में इन दिनों पूर्वी मिथिला के विभिन्न जिलों का भ्रमण कर रहे हैं। इस क्रम में दरभंगा से सहरसा पहुँचने के बाद आगे मधेपुरा, पूर्णिया, किशनगंज, अररिया, सुपौल एवं मधुबनी जिलों के विभिन्न ऐतिहासिक, पुरातात्त्विक, सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक धरोहर स्थलों का अध्ययन प्रस्तावित है।


इस पूर्ववर्ती भ्रमण का उद्देश्य यात्रा के व्यापक क्षेत्र की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को समझना, स्थानीय स्तर पर विद्यमान पुरास्थलों एवं पुरावशेषों की जानकारी एकत्र करना, परंपराओं के संवाहकों तथा स्थानीय जानकारों से संवाद स्थापित करना और उपेक्षित धरोहरों को सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनाना है। इसके माध्यम से क्षेत्र की ऐसी विरासतों को भी सामने लाने का प्रयास है, जो अभी तक व्यापक अकादमिक एवं सामाजिक पहचान प्राप्त नहीं कर सकी हैं।


डॉ. मुरारी कुमार झा के अनुसार, धरोहर केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि किसी क्षेत्र की ऐतिहासिक पहचान और सांस्कृतिक निरंतरता का आधार होती है। इसके वैज्ञानिक अध्ययन, अभिलेखीकरण और जनजागरूकता के माध्यम से ही आने वाली पीढ़ियों के लिए इस विरासत को समझने तथा उसके महत्त्व को स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है।


कांठो गाँव में प्राप्त पालकालीन गणेश प्रतिमा और पूर्व में मिले अन्य पुरावशेष इस बात की ओर संकेत करते हैं कि कोसी क्षेत्र का पुरातात्त्विक इतिहास अभी व्यापक अन्वेषण की अपेक्षा रखता है।

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